Wednesday, August 19, 2009

अनकहा ख्वाब - १

"दिया"
"जी मम्मी." कहते हुए मानो किसी स्वप्न से लौटी थी वो। आखिर ऐसा क्या था, जो उसे आज कहीं खींच रहा था। वह ख़ुद भी तो हतप्रभ थी। कल तक अपनी सखियों के साथ खेलने वाली लड़की आज अचानक से शांत और गंभीर सी लगने लगी थी। वह सोच रही थी कि उस चेहरे को देखकर ऐसा क्यूँ लगा था उसे, कि मानो वह कोई अपना ही हो। एक अनजान से लड़के ने उसे बदल दिया था।
उधर तनय भी कुछ सोच रहा था, पहली ही नजर में शायद उसे दिया भा सी गई थी। घर जाकर वह सीधे अपने कमरे में जाकर कुछ सोचता रहता है, उसे पता नही कि आज उसके साथ क्या हुआ, पर उसे ये अवश्य पता था कि आज कुछ ऐसा हुआ है, जो शायद पहले कभी नही हुआ।
बात साधारण सी ही थी। अपने एक मित्र के घर पर उसने दिया को देखा था, कुछ आकर्षित सा जरूर हुआ था तनय दिया के प्रति, पर इसमें कुछ भी नया न था। इस उम्र में ऐसा अक्सर होता है, जो तनय ख़ुद भी समझता था। एक चुलबुले, विनोदप्रिय परन्तु जीवन को लेकर गंभीर लड़के कि पहचान थी उसकी। हर लड़के कि तरह थोड़ा घूमना- फिरना और मित्रों के बीच समय बिताना उसका प्रिय शगल था। ऐसे ही एक दिन अचानक उसकी मुलाकात दिया से हुई थी एक दोस्त के घर पर। और यह मुलाकात सब कुछ बदल देने वाली थी उसकी जिंदगी में, यह तो उसे गुमान भी न था।
अगले कुछ दिनों तक उन्होंने एक दूसरे को देखा भी न था, पर उनकी नज़रों में किसी की तलाश थी। एक दिन अपनी सहेलियों के साथ अपने घर लौट रही थी दिया; अचानक उसे राह में कोई नजर आता है, तनय को देखकर उसका चेहरा खिल उठता है, और लबों पर स्वतः ही एक मुस्कान आ जाती है। तनय भी मानो जी उठता है, किसी ख्वाब से। एक चुम्बकीय सा आकर्षण महसूस करता है, वो उस निच्छल मुस्कान में। कुछ पल तो दोनों अपलक एक -दूसरे को देखते हैं, और फिर अपनी राहों पर आगे बढ़ जाते हैं बिना कोई भी शब्द कहे, पर ढेर सारी बातें किए हुए।
अपने कमरे में बैठी हुए और चेहरे को अपनी चुन्नी से ढके हुए, एक षोडशी, किसी कवि कि कल्पना जैसा ही था उसका स्वभाव उस वक्त। अभिज्ञान शाकुंतलम की शकुंतला कि भी तो यही हालत रही होगी कभी दुष्यंत के विचारों में खोये हुए। बिना कुछ भी बोले हुए कुछ शब्द कह दिए गए थे, और शायद सुने भी गए थे। एक सिलसिला सा बन गया था ये, तनय के इंतजार का, मात्र दिया की एक झलक के लिए, और दिया भी तो रोज़ अपनी राहों में उसे ही ढूँढती थी। कितने ही दिन बीत चुके थे, दोनों के मौन को। पर मौन कि भी तो अपनी भाषा होती है, और दोनों को ही पता था कि दूसरे की ऑंखें क्या कहना चाहती हैं, या फिर क्या सुनना चाहती हैं?
एक दिन तनय ने अपनी खामोशी को तोड़ने का फ़ैसला किया। संयोग से दिया भी उस दिन अपनी सहेलियों के साथ ना आकर अकेले ही आई थी। हमेशा कि तरह आज भी दिया ने उसे देखा, उसने अपनी नजरें झुका ली थीं, और उसके होठों पर थी वही मुस्कान, जिसने तनय की जिंदगी में हलचल मचाई हुई थी। तनय उसकी और बढ़ा, उसे अपनी और आता देख दिया के दिल में कुछ हलचल सी हुई, वह वहां से भाग जाना चाहती थी, तनय की इतनी नजदीकी उसे पहली बार महसूस हो रही थी, पर वह मंत्र-मुग्ध सी वही खड़ी रही, उसके दिल को इन्तजार था, तनय के होंठों से निकलने वाले शब्दों का। कुछ पल न तनय कुछ बोल सका, न वह ही वहां से हिल सकी। अचानक तनय के होंठ हिले, उसके मुँह से अपनी तारीफ सुनकर वह फ़िर से मुस्कुरा उठी। उसका चेहरा सुर्ख लाल हो उठा था। "आप बहुत ही खूबसूरत हैं, क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगी, मेरा नाम तनय है..." इतना ही कह पाया था तनय। दिया ने भी स्वीकारोक्ति में सर हिलाया था। दोनों और कुछ भी न कह सके, पर आज घर जाते वक़्त वे वो थे ही नहीं, जो कि वे चंद मिनटों पहले थे।

मैंने ख़ुद को बिखरते देखा है.

इस भीड़ में इक इन्सां को,
अकेले चलते देखा है।
सूरज को स्थिर, पृथ्वी को अचला,
सागर को मैंने बहते देखा है।
यह भी देखा है, कि
फूलों ने खिलना छोड़ दिया।
चिड़ियों कि चहचाहट को,
मैंने थमते देखा है॥

जीवन है गतिशील, जीवन परिवर्तनशील,
इस को भी सिध्द होते देखा है।
स्वार्थवश या कभी स्वयमेव,
मैंने,
हर शख्स को, बदलते देखा है॥

आंखों के सपनों को,
यथार्थ कि इन राहों पर,
मैंने दम तोड़ते देखा है।
और शायद;
इन्ही राहों पर कहीं मैंने,
ख़ुद को बिखरते देखा है॥
और शायद;
इन्ही राहों पर कहीं मैंने,
ख़ुद को बिखरते देखा है॥

Wednesday, August 12, 2009

सवेरा आया

आज एक किरण गिरी धरा पर,
सुबह - सुबह।
कली पर पड़ी, कली मुस्कुराई,
और पुष्प बनी।
दूर कहीं एक खग चहचहाया,
उठो मित्र, सवेरा आया॥

हर दिशा हुई प्रफुल्लित, ताज़ा
हवाओं का झोंका आया।
भौरों की गुंजन से, गूंजित हुई दिशाएं;
मन के भीतर एक संगीत उठा,
उठो मित्र, सवेरा आया॥

Monday, August 10, 2009

आज तुम फिर याद आए

आज एक अश्रु बहा आंखों से ,
आज तुम फिर याद आए.
सावन की कुछ बूँदें पड़ी,
तन भीगा, मन गुनगुनाये..
यादों के भंवरों में दिल खोया,
मानो कोई कली मुस्कुराए।
मन मेरा यही पुकारे,
तू फिर लौट के आ जा;
क्यूंकि आज,
क्यूंकि आज तुम फिर याद आए॥
क्यूंकि आज तुम फिर याद आए॥