Friday, May 20, 2011

कब प्यास बुझेगी इस दिल की

इस रेत से तपते जीवन में,
चाहत है, कुछ बूंदों की;
अतृप्त पड़ी इस भूमि पर,
गीले गेसूं के छीटों की.

सब हरियाली है उजड़ चुकी,
सपनो की धरा वीरान हुई;
तेरे प्रेम की बारिश से, कब
कब प्यास बुझेगी इस दिल की..




Saturday, March 5, 2011

हर सुबह, एक सी क्यूँ न होती?

हर प्रात, उठता है दिवाकर,
औ' निकलता है अपने रथ से,
रोशन करने, इस जहाँ को,
लुटाने किरणों को, अपने कर से ;

निष्पक्ष है वो,
कहीं न करता कमी;
और न,
कहीं ज्यादा देता वो;
हर शाख पर,
हर दिल पर,
समरूप,
खुशियाँ बिखेरता वो.

होता हूँ किसी सुबह खुश;
कभी अनुभव होता,
मानो रात हो कटी,
किसी भयावह स्वप्न में;


उठता है सवाल,
मेरे मन में 'पंकज',
आखिर,
हर सवेरा,
एक सा क्यूँ न होता?
कि आखिर,
हर सवेरा,
एक सा क्यूँ न होता?

Monday, February 14, 2011

वो सुबह, जरूर आएगी.

एक दिन,
ये शाम,
जो होती जा रही है,
अँधेरी;
ढल जायेगी.

एक दिन
ये रात,
गहराती जा रही है,
वो भी,
गुजर जायेगी.

होगी होठों पे मुस्कान,
औ' दिल में उछाह;
एक दिन,
वो सुबह आएगी.
एक दिन,
वो सुबह आएगी.

Wednesday, November 17, 2010

तुम्हारी आँखें

" मेरे प्रेम! तुझको समर्पित"


जब
पहली बार देखा,
उन आखों को,
ऐसा हुआ,
जैसा पहले,
कभी न हुआ था,

नटखट सी आँखें,
मानों हँस रही हों,
और कुछ
कह रही हों,
या फिर
चाहती हों कुछ कहना;

कुछ तो था उनमें,
थोडा सा प्यार,
थोड़ी सी शरारत,
और ढेरों नजाकत।

देखा था उन आखों में कुछ,
कुछ ऐसा,
कि
इक पल में ही,
छिन गया था सब कुछ।


आज वो आँखें,
कितनी रूठी हैं मुझसे,
कभी जो किया करती थी
ढेरो बातें मुझसे।

मानों कह रही हो वो,
अब नहीं है मुझको
जरूरत तुम्हारी,
और न तुम्हारी,
यादों कीं,
न ही तुम्हारी,
बातों कीं॥

था उन आँखों में
शायद कुछ और ही;
जो मैं,
ना देख सका,
या फिर,
कभी देखना ही चाहा

पर,
क्या सच में है संभव,
रहना अनजानों सा,
अलग दिशा में,
बहते हुए वितानों सा।

दूर भले ही सदा,
रहूँ
तुमसे;
पर हमेशा देखूंगा,
हमेशा सुनूँगा,
जो कभी पढ़ा था
तुम्हारी आँखों से॥

Tuesday, June 8, 2010

संसद में शराबी

गाँधी की रोती आत्मा पर हमें तरस भी न आया
.......सुना कि अब संसद जायेंगे विजय माल्या...

Sunday, January 31, 2010

ओ! मेरे निष्ठुर प्रेम.....तुम लौट आओ न

फिर से,
       देखना चाहता हूँ,
       तुम्हारी मुस्कान.
फिर से,
       करना चाहता हूँ बातें,
       तुम्हारी चमकीली आँखों से.

फिर से,
       खोना चाहता हूँ,
       तुम्हारे लहराते आँचल में..

सोचा न था,
          कि,
          तुम सिर्फ,
          ख्वाबों में सिमट जाओगी...
सोचा न था,
        छोड़ मुझको अकेला,
        यूँ ही,
       चली जाओगी..

खिड़की पर बैठा,
           देखता हूँ दूर क्षितिज,
होती बेचैन नजर,
          तुझको कहीं न पाकर.
दिन से रात, रात से दिन,
         यूँ ही बीतें जातें हैं,
सोचता हूँ नींद ही उतरे,
        तेरे केशों से गुजरकर,
        कभी, चुपके से आकर..

स्वप्न में ही खिड़की लाँघ,
        जाऊं क्षितिज के पार,
शायद मिलो वही तुम,
       करती मेरा इंत-जार..
फिर से,
        तुमसे बातें करूँ,
        बगैर,
        किसी शब्द के साथ..
उमंगित किसी हिरणी सी,
        प्रफुल्लित किसी मंजरी सी,
        शायद सच में,
        शायद सच में,
        तुम हो उस पार.......

फिर से,
        फिर से आकर वापस,
        मेरे अश्रु, मुझे लौटाओ न.
ओ!
       ओ! मेरे निष्ठुर प्रेम,
       तुम लौट आओ न.

ओ! मेरे निष्ठुर प्रेम,
       तुम लौट आओ न..........




      

Thursday, December 31, 2009

नव वर्ष

नई सोच, नई राहें;
होगीं कुछ नई बातें,
नया प्रभात, नई किरण,
गुलाबी ठण्ड में भीगे मन।
हों खुशियाँ,
और ढेरो मुस्कान,
स्वागत नव नर्ष,
तेरा हार्दिक अभिनन्दन॥