Saturday, August 25, 2012

यह कैसा सफ़र

चलते चलते जो हुई, जलन पावों में,
देखा, एक छाला था, निकल आया;
मलहम के लिए, जो हाथ बढ़ाया,
कोई भी तो उसे, देने न आया;

राह से नज़र हटाई, चहुँओर दौड़ाई,
उस सूने इलाके में, कौन नज़र आया;
इसाँ तो दूर, एक दरख्त भी, न पड़ा दिखाई,
चारो ओर था, तो बस, कड़ी धूप का साया.

इस सन्नाटे में, किससे था डर का एहसास,
दिल मेरा तो, मेरे ही मौन से, था घबराया;
कुछ अलग करने की, थी मेरी कोशिश,
फिर यह, अलगाव लोगों से, क्यूँ आया;

तमाम उम्र, इस सफ़र में रहा भागता,
आखिर मैं यह, कहाँ निकल आया,
पूरे सफ़र में कम, होते रहे हमराही,
कौन सी यह राह, जिसे मैंने अपनाया. 

स्तब्ध, वहीँ रहा सोचता, घंटों,
यह कैसा है मुकाम, जिसे मैंने पाया;

तूने पाया, अपने सपनों को 'पंकज',
झूठ ही सही, दिल को, यही समझाया;
झूठ ही सही, दिल को, यही समझाया.

Sunday, July 1, 2012

ओ पुरवाई, ओ पुरवाई;

ओ पुरवाई, ओ पुरवाई;
अच्छा हुआ, जो तू आई.
पर तू क्यूँ अकेले आई;
बरखा को क्यूँ छोड़ आई.

ओ पुरवाई, अब वापस जा;
काले मेघ और बरसा ला;
सारे मिलकर उधम मचाना,
हम सब को फिर तुम नहलाना.

(चित्र साभार - आशीष पटेल) 

Sunday, March 4, 2012

ओ खुशी! तू रहती है कहाँ?

ओ खुशी! 
तू रहती है कहाँ?

जो रहती तू महलों के भीतर,
क्यूँ तजता सिद्धार्थ तुझे;

जो रहती तू स्वर्ण के मध्य,
क्यूँ दिखते अमीरों के चेहरे,
बनावटी मुस्कान से भरे;

जो रहती तू तलवारों में,
इंसान की इंसान पर ही विजय में;
क्यूँ लगते विजेता क्रूर से,
बजाय के हँसते हुए;

गर शरण मिलती तुझे,
किसी गरीब की कुटी में,
क्यूँ कोई तुझे त्याग;
बांधता रस्सी को छत से,
और देता प्राण झूल उसपे;

हर पल तलाशता फिरता तुझे,
न मिल सका लेकिन,
कभी नजदीक से भी;

अब तू ही बता,
किस राह है तेरा निवास;
जिस ओर जाकर तलाशूँ तुझे.

-खुशी की खोज में भटकता एक पथिक. 

Wednesday, February 22, 2012

बंदी

बुनते हैं ज़ाल,
हम खुद के चारों ओर;
जानते हुए यह,
कि मुमकिन न होगा,
इससे निकलना. 

हर दिन जोड़ते हैं,
एक नया तन्तु उसमे,
और पूरे होने पर,
छटपटाते हैं,
बाहर निकलने को उससे.

Wednesday, February 8, 2012

हमारा मिलना

ख्वाब थी तुम,
या फिर हकीकत;
मैं कभी मिला तुमसे,
या वो था बस, मन का भरम;
जो है आज भी, बसा मन में,
और देता,
ढेरों मीठे एहसास.
क्या वो सच था?
या वो था बस, मन का भरम.

वो तेरे हाथों का स्पर्श,
जो आज भी, सिरहन देता;
या, 
बसंत के नव पुष्पित, फूलों सा मुस्काना;
और कभी,
यूँ ही किसी बात पर,
नजरों को झुकाना;
क्या वो सच था?
या वो था बस, मन का भरम.

न जाने कितने,
ख्वाब बुनता हूँ आज भी;
तुम ही होती हो,
उस हर इक ख्वाब में,
और हर एहसास में.
फागुन की हवा,
छूती जब तन को,
क्यूँ याद आता है,
तेरा आँचल.
जब गुजरता हूँ, उन राहों से;
जहाँ साथ तय किये थे, हमने फासले;
और वादे किये थे, कभी न जुदा होने के.
आंसू खुद ही अपनी राहें है खोजते.

हमारा मिलना,
क्या वो सच था?
या वो था बस, मन का भरम.

Saturday, December 17, 2011

यूँ ही अकेले

हर शाम;
कितना तन्हा होता है यह मन;
सोचता है,
आखिर कब तक जियोगे यह दोहरा जीवन.

यूँ तो मैं हँसता हूँ, 
होता हूँ जब औरों संग; 
याद नहीं,
कब दिल में घुला था,
कोई ख़ुशी का रंग.

कोहरे की हो धुंध,
या सावन की बारिश;
औ' कभी जलती दोपहर का दिन;
अकेले रहना ही मानो नियति हो,
यूँ ही बीत रहे ये मेरे दिन;

काश कोई समझता,
वो छुपी हुई उदासी,
जिसको हर वक़्त ढक कर रखती है,
मेरी ये हंसी.
वो उदासी जो कभी न आती चेहरे पर,
पर है अंतर्मन में बसी;
अकेले होने पर;
सिर्फ पलकों को भिगोती कभी;

अब तो छोड़ दी उम्मीद भी,
कि होगी कभी इस सूनी धरा पर,
बारिश खुशियों की.
ये बंजर भूमि  है अभिशप्त, 
पाने को बस कुछ बूंदे,
मेरे आंसुओं की. 

क्यूँ रोता ये मन, 
इन व्यर्थ की बातों में;
परदों में रहने की 'पंकज',
अब तो हो गयी आदत हमें.

Sunday, November 20, 2011

मैं, मैं हूँ;

प्रस्तुत कविता कुमारी श्वेता सिंह द्वारा रचित कविता "Who Am I" का हिंदी अनुवाद है. कविता के अनुवाद की अनुमति देने पर मैं उनका आभार प्रकट करता हूँ. 


मैं, मैं हूँ; न कम न ज्यादा

शांत, मानो कोई
सुख अनंत,
बिखरी ताश के ढेर सी,
या, खोज में,
पौराणिक कल्पना, जैसी सम्पूर्णता में.
मैं मैं ही हूँ, न कम न ज्यादा

ताजा हवा के झोंके सी,
रेगिस्तान के धूल सी,
दिल की धड़कने भी, कभी मचाती हैं शोर,
औ' कभी होती शांत किसी गहरी घाटी सी,
मैं, मैं हूँ; न कम न ज्यादा

ठहरी, फिर भी चलती हुई
कभी मुस्काती, कभी रोती,
कभी विजेता, कभी पराजित,
मैं,
मैं हूँ;
न कम न ज्यादा.