Monday, November 10, 2014

एक मुठ्ठी आसमाँ

बहुत दूर दिखाई देता हैं आसमाँ;
इतना दूर, कि उसे छूने की हसरत में,
बीत जाती है, सारी उमर;

एक दिन मुठ्ठी में भरके लाएंगे उसे,
बिछायेंगे उसे इसी धरती पर,
बैठ उस पर खेलेंगे,
बैठ उस पर खेलेंगे,अपने सपनों से,

उस खेल में जीतेंगे कौड़ी दर कौड़ी,
हटा देंगे,
हटा देंगे, जीवन से वो पल,
जब हमने किये समझौते;

जिएंगे उस दिन के बाद,
सपनों के साथ, जो जिद्द पाले थे,
कि पाना है तुम्हे,
मुठ्ठी भर आसमाँ।

बस,
जरूरत है;
बस,
जरूरत है; समझने की,
कि सपनों को रोककर भी जीना,
क्या कोई जिंदगी है.

अच्छी नींद तभी आती है,
जब इस नग्न, कठोर धरातल पर,
आप बिछाते हैं,
सपनों की उस चादर को,
जो आपका प्रारब्ध है;
उस चादर को,
जिसे छूना आपकी हसरत है.
और उस चादर को,
जिसे पाने की चाहत को,
दिल में ही दबाये,
लोग जिए चले जाते हैं;
और सोचते हैं, फिर;
हम कभी अच्छे से सोये नही.
क्यूंकि, आज भी;
जीने के बाद भी, मरने के बाद भी,
नींद टूटती है, उनकी रातों में,
और कहती है,
काश तुमने एक कोशिश की होती,
समझने की,
समझने की, कि सपने क्या हैं तुम्हारे,
होना क्या चाहते थे तुम,
और अंत में क्या बनकर मुर्दे बने लेटे हो;

नींद आती तुमको,
नींद आती तुमको,
जो की होती कोशिश तुमने,
पाने को अपने हिस्से का,
एक मुठ्ठी आसमाँ।

आजाद होना है
आजाद होना है, हर बंधन से,
मुक्त करना है खुद को,
लोगों की अपेक्षाओं से,
बनी बनाई पगडंडियों से,
समझेंगे थोड़ा, आखिर,
जीना क्या है,
सीखेंगे उसको थोड़ा थोड़ा,
जानेंगे अपने सपनों को,
दौड़ेंगे पाने उनको,
जिनकों पाने की हसरत भर में,
लोग जीते गए, मरते गए।

लेकर आएंगे, हम जब,
धरती पर अपने आसमान को,
और उस चादर को, बिछा सोएंगे,
नींद आएगी हमको तब;

जीवन के खेल के सारे पासे,
सारी कौड़ियां, जीतेंगे;
एक एक करके,
क्यूंकि हाथों में होगा जो,
मेरा एक मुठ्ठी आसमाँ।।

Wednesday, November 5, 2014

अस्तित्व



पतझड़ का मौसम;
पेड़ों से गिरते पत्ते,
पीले, लाल, भूरे,
सूखे से पत्ते;
पत्ता पत्ता,
मैं भी झर रहा,
उनके जैसे;

हल्की हवा भी,
उड़ा लेती उनको,
और ले जाती,
किसी, और ही दुनिया में,
डालों से टूटे पत्ते,
और वो,
जो बिखरे मुझसे

सागर की खारी बूँदे,
होड़ लेते उनसे मेरे आँसू,
अस्तित्व उसका घुल जाता,
मिल जाता है,
सागर में;
मैं भी घुल गया हूँ,
उस विशाल जलद में।

दोनो हाथ फैलाये,
मैं,
खड़ा हूँ,
रेत के टीले पर;
रेतीली आंधियाँ,
होती हैं कितनी खुश्क,
छा जाता है अंधकार,
रेत के बादलों का,
और जब छँटता वो;
गुम हो जाता,
मैं साथ उसके।

अब मैं प्रकृति हूँ,
प्रकृति मुझमे;
घुल गया, अपना अस्तित्व मिटा,
वापस से प्रकृति में।।

Thursday, March 13, 2014

"मुझे याद है"

मुझे याद है।  मुझे याद है वो पल, जब हम बैठे हुए गंगा के किनारे पर और यूँ हीं अचानक से तुमने कहा कि क्यूँ न उस पार चलकर देखें नदी के दूसरे किनारे को, मानो वहाँ कोई और दुनिया बसती हो।  मुझे याद है ठण्ड के उस मौसम में खिली हुई धूप में किया गया नाव का वो सफ़र, सफ़र जिसमे तय की थी हमने दूरी शून्य से अनंत की।  मुझे याद है आज भी वो "छप" की आवाज जो आती थी, जब चप्पू हौले से समा जाता था गंगा के पानी में। उसमे और संसार के सारे संगीत के सम्मिलित स्वरों में क्या अंतर है, आज भी न समझ सका। मुझे याद है, उस वक़्त हुई हमारी ढेर सारी बातें, जो हमारी आँखों ने कही और सुनी थीं।
Credit - Vatika Singh
मुझे याद है, उन बातों में तुम्हारा कहा गया एक - एक शब्द जिनमे छुपा था तुम्हारा सारा प्यार। 
मुझे याद है, नदी का वो दूसरा किनारा, जहाँ हमने लिखा था रेत के कणों पर अपना नाम यह सोचकर कि कभी यह रेत के कण पत्थर बनेंगे और हमारा नाम अमर हो जाएगा युगों युगों के लिए।  रेत के उन कणों को भी अपने आप पर कितना अभिमान आया होगा।  मुझे याद है, घंटों तक बैठ कर हम निहारते रहे डूबते हुए सूरज को।  उसकी लाल किरणें तप्त थीं, उतनी ही जितना हमारा प्यार और शीतल भी थीं, उतनी ही जितनी उस ढलती शाम में रेत।  हमारे ह्रदय की हालत भी तो कुछ ऐसी ही थी।  मुझे याद है उन लाल रश्मियों का नदी की लहरों के साथ नृत्य करना और हमारे मन-मयूर का उस नृत्य से ताल से ताल मिलाना। 
मुझे याद है, मुझे याद है वो दिन, वो शाम और उस दिन के बाद बीते कई वैसे दिन। मुझे याद है और हमेशा याद रहेगा वो दिन और उसके बाद बितायी गयी तारों की चादर तले सारी रात। 

Wednesday, March 12, 2014

विश्वास

दोनों एक पहाड़ी नदी के किनारे पर बैठे थे। लड़की उठकर नदी के पानी की ओर बढ़ी; वह भी उसके साथ चल पड़ा। उसने लड़के का हाथ थामे हुए पानी में अपना पहला कदम रखा, कदम थोड़े डगमगाए। उसने पलटकर देखा, वह एकटक उसे देख रहा था, उसको देखकर उसे भरोसा हुआ, वैसा जैैसा अक्सर लोगों को हो जाता है, साथ जीने का, साथ मरने का। वह थोड़ा और आगे बढ़ी, बहाव बहुत तेज था; उसके लिए अपने पैर सम्भाल पाना भी मुश्किल था.
लड़के को लगा कि अब वह उसे साथ लेकर नहीं लौट सकेगा। उसने लड़की की ओर देखा, उस लड़की की आँखों में अटूट विश्वास भरा हुआ था, और चेहरे पर सुरीली सी मुस्कान। उसने लड़की का हाथ छोड़ दिया और किनारे की और लौट चला। 

Wednesday, January 22, 2014

"मैं अनन्त हूँ"

कहीं दूर एक आकाशगंगा में एक तारा अपनी उम्र पूरी कर चुका है। उसके अंदर की उर्जा खत्म होती दिखाई दे रही है, वह सिकुड़ता जाता है; उसका अस्तित्व मिटने को है, अचानक!
अचानक से उस तारे में एक महान विस्फोट होता है, और उसके गर्भ से बिखर पड़ते हैं नये बने तत्व सारे ब्रह्माण्ड में। ऐसे करोड़ो अरबों तारों में निर्माण होता है हर उस तत्व का जो हममें हैं। करोड़ों और वर्ष लगते हैं जीवन की उत्पत्ति होने में, और मेरा, मेरा आस्तित्व तो बहुत ही नया और क्षणिक है। पर मुझमे समाहित है वो सारा इतिहास, वो सारी ऊर्जा।
मैं अनन्त हूँ। 

Tuesday, December 24, 2013

सुबह कभी ना हुई

एक दिन...
एक दिन सुबह हुई, पर सुबह ना हुई,
एक दिन..
एक दिन पक्षी चहचहाये, पर उनसे स्वर न आये।

एक दिन..
एक दिन फूल खिले, पर बहार न आई।
एक दिन..
एक दिन धूप तो हुई, पर अंधेरा न मिटा.

एक दिन..
तितली ने उड़ना छोड़ दिया,
उस दिन...
उस दिन नदी ने बहना छोड़ दिया,

उस दिन...
उस दिन, रंग स्याह से थे,
उस दिन...
उस दिन, सारा दिन रात सी थी।

उस रात..
उस रात चाँद पूरा निकला, पर चांदनी न हुई।
उस रात और उस दिन..
उस रात और उस दिन, बस तुम साथ न थी।


और फिर,
और फिर, बहार कभी ना आई;
और फिर,  चांदनी क़भी ना खिली,
और फिर,
और फिर,  सुबह कभी ना हुई।

Sunday, December 22, 2013

सदाबहार

उसके आँगन में एक छोटा सा पौधा था, सदाबहार का. उसको पता नहीं था कि कब उसे अच्छा लगने लगा था उस पौधे के पास बैठना। जब भी वो खुश होती, उस सदाबहार के पौधे के पास जाती और वो पौधा उसे ढेरो फूल देता था; और उन फूलों को हाथ में लेकर उसके होंठों पर एक मुस्कान आ जाती थी। उसकी मुस्कान देखकर सदाबहार का वो नन्हा सा पौधा और भी खिल उठता था; अगले दिन, वह भी इन्तजार करता था कि कब वो आये और वह उसे अपने फूल दे सके.
एक दिन वो बाजार से गुजर रही थी, उसने एक पौधों की दुकान में एक बड़े से फूल को देखा; उसने उस फूल के पौधे को खरीद लिया और उसे एक गमले में लगाकर अपने कमरे के बाहर छज्जे में रख दिया। अब हर रोज वह उस बड़े फूल वाले पौधे के पास बैठती थी। इसके पास बैठना तो उसे बहुत अच्छा लगता था , पर यह पौधा उसे फूल नहीं लेने देता था। जब वो कोई फूल लेने की कोशिश करती थी, उसके हाथ में काँटा लग जाता था। ऐसा होने पर उसे अपने सदाबहार के उस पौधे के याद आती थी, जो अभी भी आँगन के एक कोने में चुपके से खड़ा उसका इंतज़ार किया करता था। कभी-2 किसी बात पर दुखी होने पर वह जाती थी, उस सदाबहार के पौधे के पास। धीरे धीरे करके वो पौधा मुरझा रहा था, उसकी पत्तियाँ पीली पड़ने लगी थीं, फिर भी जब भी वो उसके पास जाती थी, वह पौधा अपने सारे नन्हे फूल उसको दे देता था, जिसको पाकर वह मुस्कुराने लगती थी और वह पौधा वापस से कुछ खिल उठता था। 
बड़े फूल वाला पौधा अभी भी उसको ज्यादा प्यारा था, वह उसके ज्यादा पास भी था। वह अभी भी उसके ही पास बैठती थी घंटो, पर उसमे फूल आने अब कम हो गए थे, और कुछ समय बाद उसमे कोई भी फूल न था। उस दिन वह बहुत रोई, उसे अपने सदाबहार के पौधे की याद आयी, जिसने उसे हर दिन फूल देने का मानो वादा किया था, और उसे हमेशा निभाया भी था; फिर भी जिसके पास जाना उसने बंद कर दिया था। उसने वापस से उस सदाबहार के पौधे के पास जाने के बारे में सोचा, इस उम्मीद में कि वह आज फिर से उसे कुछ फूल देगा जिसको पाकर वह मुस्कुरा सकेगी। आँगन में जाकर उसने देखा कि सदाबहार का पौधा पूरी तरह मुरझा चुका है। शायद वह उसको फूल देकर और उसकी मुस्कान देखकर ही जिन्दा था; और उसकी बेरुखी ने शायद उस नन्हे पौधे को ख़त्म कर दिया था।
उसकी आँखों में उस नन्हे मृत पौधे को देखकर बहुत से आँसू आये, पर उन आँसुओं से भीगने पर भी उस आँगन में फिर कभी कोई सदाबहार का कोई पौधा न खिला।