Wednesday, January 22, 2014

"मैं अनन्त हूँ"

कहीं दूर एक आकाशगंगा में एक तारा अपनी उम्र पूरी कर चुका है। उसके अंदर की उर्जा खत्म होती दिखाई दे रही है, वह सिकुड़ता जाता है; उसका अस्तित्व मिटने को है, अचानक!
अचानक से उस तारे में एक महान विस्फोट होता है, और उसके गर्भ से बिखर पड़ते हैं नये बने तत्व सारे ब्रह्माण्ड में। ऐसे करोड़ो अरबों तारों में निर्माण होता है हर उस तत्व का जो हममें हैं। करोड़ों और वर्ष लगते हैं जीवन की उत्पत्ति होने में, और मेरा, मेरा आस्तित्व तो बहुत ही नया और क्षणिक है। पर मुझमे समाहित है वो सारा इतिहास, वो सारी ऊर्जा।
मैं अनन्त हूँ। 

Tuesday, December 24, 2013

सुबह कभी ना हुई

एक दिन...
एक दिन सुबह हुई, पर सुबह ना हुई,
एक दिन..
एक दिन पक्षी चहचहाये, पर उनसे स्वर न आये।

एक दिन..
एक दिन फूल खिले, पर बहार न आई।
एक दिन..
एक दिन धूप तो हुई, पर अंधेरा न मिटा.

एक दिन..
तितली ने उड़ना छोड़ दिया,
उस दिन...
उस दिन नदी ने बहना छोड़ दिया,

उस दिन...
उस दिन, रंग स्याह से थे,
उस दिन...
उस दिन, सारा दिन रात सी थी।

उस रात..
उस रात चाँद पूरा निकला, पर चांदनी न हुई।
उस रात और उस दिन..
उस रात और उस दिन, बस तुम साथ न थी।


और फिर,
और फिर, बहार कभी ना आई;
और फिर,  चांदनी क़भी ना खिली,
और फिर,
और फिर,  सुबह कभी ना हुई।

Sunday, December 22, 2013

सदाबहार

उसके आँगन में एक छोटा सा पौधा था, सदाबहार का. उसको पता नहीं था कि कब उसे अच्छा लगने लगा था उस पौधे के पास बैठना। जब भी वो खुश होती, उस सदाबहार के पौधे के पास जाती और वो पौधा उसे ढेरो फूल देता था; और उन फूलों को हाथ में लेकर उसके होंठों पर एक मुस्कान आ जाती थी। उसकी मुस्कान देखकर सदाबहार का वो नन्हा सा पौधा और भी खिल उठता था; अगले दिन, वह भी इन्तजार करता था कि कब वो आये और वह उसे अपने फूल दे सके.
एक दिन वो बाजार से गुजर रही थी, उसने एक पौधों की दुकान में एक बड़े से फूल को देखा; उसने उस फूल के पौधे को खरीद लिया और उसे एक गमले में लगाकर अपने कमरे के बाहर छज्जे में रख दिया। अब हर रोज वह उस बड़े फूल वाले पौधे के पास बैठती थी। इसके पास बैठना तो उसे बहुत अच्छा लगता था , पर यह पौधा उसे फूल नहीं लेने देता था। जब वो कोई फूल लेने की कोशिश करती थी, उसके हाथ में काँटा लग जाता था। ऐसा होने पर उसे अपने सदाबहार के उस पौधे के याद आती थी, जो अभी भी आँगन के एक कोने में चुपके से खड़ा उसका इंतज़ार किया करता था। कभी-2 किसी बात पर दुखी होने पर वह जाती थी, उस सदाबहार के पौधे के पास। धीरे धीरे करके वो पौधा मुरझा रहा था, उसकी पत्तियाँ पीली पड़ने लगी थीं, फिर भी जब भी वो उसके पास जाती थी, वह पौधा अपने सारे नन्हे फूल उसको दे देता था, जिसको पाकर वह मुस्कुराने लगती थी और वह पौधा वापस से कुछ खिल उठता था। 
बड़े फूल वाला पौधा अभी भी उसको ज्यादा प्यारा था, वह उसके ज्यादा पास भी था। वह अभी भी उसके ही पास बैठती थी घंटो, पर उसमे फूल आने अब कम हो गए थे, और कुछ समय बाद उसमे कोई भी फूल न था। उस दिन वह बहुत रोई, उसे अपने सदाबहार के पौधे की याद आयी, जिसने उसे हर दिन फूल देने का मानो वादा किया था, और उसे हमेशा निभाया भी था; फिर भी जिसके पास जाना उसने बंद कर दिया था। उसने वापस से उस सदाबहार के पौधे के पास जाने के बारे में सोचा, इस उम्मीद में कि वह आज फिर से उसे कुछ फूल देगा जिसको पाकर वह मुस्कुरा सकेगी। आँगन में जाकर उसने देखा कि सदाबहार का पौधा पूरी तरह मुरझा चुका है। शायद वह उसको फूल देकर और उसकी मुस्कान देखकर ही जिन्दा था; और उसकी बेरुखी ने शायद उस नन्हे पौधे को ख़त्म कर दिया था।
उसकी आँखों में उस नन्हे मृत पौधे को देखकर बहुत से आँसू आये, पर उन आँसुओं से भीगने पर भी उस आँगन में फिर कभी कोई सदाबहार का कोई पौधा न खिला।  

Sunday, December 8, 2013

चंद पंक्तियों की जिंदगानी


मैं था, वो थी, और खुशियाँ थीं।
मैं हूँ, वो ना है,  और ना ही खुशियाँ हैं।

"थीं" और "हैं" के इस फासले में ही सारी जिन्दगी है।

Tuesday, November 12, 2013

थोड़ा सा प्रेम

क्या पता न था मुझे,
कि यह होना है,
फिर भी;

फिर भी,
मैं ना रोक सका,
और पहुँचायी चोट खुद को,
एक बार फिर से;

क्या पहले ना हुआ था,
ऐसा मेरे साथ,
फिर भी,
हर बार;

फिर भी, हर बार;
जाने क्यूं, 
खोता हूँ, अपना दिल;

और आँसुओं,
से भीगता है,
ये दिल,
फिर से।

क्या प्रत्युत्तर हो सकते हैं,
उपेक्षा, घृणा या धोखा,
उस भावना के,
प्रेम, स्नेह;

क्या सोचना है गलत,
प्रेम के बदले,
मिले प्रेम;
उतना ना सही,
थोड़ा सा ही।

जब मिला तुमसे,
भूल गया था, कुछ पल को,
कि अभी तो टूटा है,
दिल मेरा;

फिर भी,
डूब गया, आँखों में तुम्हारी,
बातों में तुम्हारी.

कितना था भरोसा, मुझे 
तुम पर;
काश! उतना भरोसा होता,
तुमको भी।

क्यूं हो गयी यूं दूर,
अचानक,
बताया तक नहीं,
वजह इस बेरुखी की;
शायद
दे ना सका मैं, वो
भरोसा तुमको,
जिसकी थी तुमको चाह।

ढूंढा तुमने वह विश्वास,
किसी और में;
हमारे रिश्ते पर,
आयी ये छाया,
किसकी।

हमेशा की तरह,
रहा अकेला,
मैं,
फिर से।

Sunday, October 20, 2013

कहाँ अब रहा जीना मुनासिब.

अश्रुपूरित नेत्रों से देखते रहे, जाने की राह तेरी;
सोचते रहे, कि आखिर हमने खता क्या की?

सागर से भी ज्यादा बूंदे थी इस जलद में,
फिर प्रेम के दरिया के सूखने की वजह क्या थी?

जो जरा सी धूप होते ही छोड़ना था तुमको साथ,
हमसाया बनने का वादा क्यूँ किया?

तमाम बंदिशों का इल्म तो था तुमको जब,
हरदम साथ रहने का हमने, इरादा क्यूँ किया?

काश, न मिलते कभी तुमसे
थामते न कभी हाथ तेरा,
होता यही, कि जी न होती जिंदगी कभी;
यूँ भी कहाँ, अब रहा जीना मुनासिब.

Saturday, September 21, 2013

अनदेखे सपने

एक शहर था, जिसमे रहते थे दो दोस्त। हम उनको पहला और दूसरा ही कहकर पुकारेंगे, क्यूंकि कहानी के लिहाज से उनके नाम महत्वपूर्ण नहीं हैं। एक बात थी, जो दोनों की दोस्ती  को विचित्र बनाती थी। हर दिन वो मिलते थे, शहर के किनारे से गुजरने वाली एक शांत नदी के किनारे पर खड़े एक गुलमोहर के पेड़ के नीचे; तब पहला दूसरे को बताता  पिछली रात देखे अपने सपने के बारे में। और उससे भी विचित्र बात यह थी कि पहला हर रात एक सपना देखता था. दूसरा उसके सपनों को सुनता था और उसका अर्थ ढूंढता था। फिर दोनों मिलकर निकल जाते थे, उस सपने की दुनिया में सैर करने। दोनों के दिन ऐसे ही कट रहे थे, बेहद ही खुशनुमा। उनके सपनो की दुनिया बहुत विशाल थी; कभी वो जाते थे परियों के देश, तो कभी देवताओं की नगरी की सैर करते थे। और सबसे खूबसूरत सपनों की सैर तो तब होती थी जब दोनो किसी आम के बगीचे में बैठकर घंटो मीठे रसीले आमों का आनंद लेते थे।


धीरे धीरे दोनो बड़े हो गये। पर उनका सपने देखने, साझा करने, अर्थ पूछने और उनमें सफर करने का क्रम ना टूटा। पर फिर, एक दिन कुछ अलग सा हुआ। उस रात पहले को कोई भी सपना ना आया। अगले दिन दोनो बैठे थे अपनी पसंदीदा जगह, जो खूबसूरत थी या नहीं, ये तो पता नहीं, पर उनकी तमाम यादों से जुड़ी होने की वजह से उन दोनों की ही पसंदीदा हो गयी थी। और वो दिन भी बसंत के थे। गुलमोहर के उस पेड़ के नीचे बिखरे सैकड़ों गुलमोहर के फूल ऐसे लग रहे थे मानो शांत भूमि पर बिछे जलते हुए कुछ अंगारे।  दूसरा इस इंतजार में था कि कब पहला पिछली रात के स्वप्न की बात करे उससे, और दोनों एक नए सफ़र पर चलें। 

पर उस दिन तो पहले के पास कहने को कोई भी स्वप्न ना था। शांत बैठा रहा वो, बस इतना कहा उसने कि "कल रात मुझे कोई भी सपना ना आया". और वो अंगारे भूमि से ऊपर उठकर मानों वातावरण में व्याप्त हो गए. पहला बेहद ही दुःख अनुभव कर रहा था अपने मित्र को निराश करने पर. दुसरे ने पूछा "क्या सच". पहले ने सिर्फ हाँ में अपने सिर हिलाया। दूसरे ने आगे कुछ ना कहा और दोनो फिर भी बैठे रहे वहां काफी वक़्त तक और नियमित किस्म की बातें करते रहें। पर आज का दिन थोड़ा लम्बा रहा, क्यूंकि आज, वो बस उस गुलमोहर के नीचे ही बैठे थे, और बस बैठे रहे, न कि गए किसी सफ़र पर। 


अब तो एक नया ही क्रम बन गया, पहले को सपने आने पूरी तरह बंद हो गये थे; क्यूं ये तो नहीं पता, पर था ऐसा ही। और अगर सपने आते भी पहले को, तो वो सपने कम और सच ज्यादा होते थे।  अब भी बैठते थे हर दिन दोनो उसी गुलमोहर के नीचे, और हर दिन, दिन की लंबाई बढ़ती जा रही थी। जब पहले को सपने आते भी थे, तो भी उन सपनों में सफर करने नहीं जाते थे दोनो, क्यूंकि वो होती थीं, वही सच्चाइयाँ जिनको जीते थे हर दिन दोनो, और शायद जिनसे बचने को ही दोनो हर दिन जाते थे सपनों की दुनिया में सफर करने को।

और एक दिन दूसरा रोज के जाने के वक़्त से कुछ पहले ही उठ गया वापस जाने को, क्यूंकि दिन थोड़े लम्बे हो गये थे ना। जब वो चलने लगा, पहला बस उसे देखता रहा और सोचने लगा उन सपनों के बारे में जो उसने उन रातों में देखे थे, जब उसने सपने नहीं देखे थे।