Wednesday, November 17, 2010

तुम्हारी आँखें

" मेरे प्रेम! तुझको समर्पित"


जब
पहली बार देखा,
उन आखों को,
ऐसा हुआ,
जैसा पहले,
कभी न हुआ था,

नटखट सी आँखें,
मानों हँस रही हों,
और कुछ
कह रही हों,
या फिर
चाहती हों कुछ कहना;

कुछ तो था उनमें,
थोडा सा प्यार,
थोड़ी सी शरारत,
और ढेरों नजाकत।

देखा था उन आखों में कुछ,
कुछ ऐसा,
कि
इक पल में ही,
छिन गया था सब कुछ।


आज वो आँखें,
कितनी रूठी हैं मुझसे,
कभी जो किया करती थी
ढेरो बातें मुझसे।

मानों कह रही हो वो,
अब नहीं है मुझको
जरूरत तुम्हारी,
और न तुम्हारी,
यादों कीं,
न ही तुम्हारी,
बातों कीं॥

था उन आँखों में
शायद कुछ और ही;
जो मैं,
ना देख सका,
या फिर,
कभी देखना ही चाहा

पर,
क्या सच में है संभव,
रहना अनजानों सा,
अलग दिशा में,
बहते हुए वितानों सा।

दूर भले ही सदा,
रहूँ
तुमसे;
पर हमेशा देखूंगा,
हमेशा सुनूँगा,
जो कभी पढ़ा था
तुम्हारी आँखों से॥

4 comments:

  1. आँखें बहुत कुछ कह देती हैं ..बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति



    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

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  2. आँखें बहुत कुछ कहती हैं, पर देखा जाय तो फिर आँखें झूठ भी बोल सकती हैं.

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  3. jaruri to nai h na ki aakhon ki baatein saamne wale sahi hi padhein....aankhein shyad galat ya jhoot nai hi bol rahi ho, agar saamne wali aankhein unhe galat samajhna h soch k baithi ho....to phir un annkhon ki kya galti?????

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  4. @anonymous - pata nahi ki aap kaun ho, par aapne jo kaha vo poori tarah se sach hai........ par fir in aaknon ki bhasha ka arth hi kya rah jaayega.

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